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संतुष्टि

          संतुष्टि         

एक नई प्रेमकहानी लिख रहा था लेकिन घर में शोर कुछ ज्यादा ही था, तो मैं डायरी लेकर अपने दोस्त ऋतिक के कैफ़े में चला गया , ऋतिक कैफ़े में नहीं था तो मैंने खुद ही काउंटर पर कॉफी के लिए बोला और सबसे कोने वाली एक टेबल पर अपना अड्डा जमा लिया जहाँ हम दोस्त अक्सर ही बैठा करते थे।

अचानक कुछ खयालों की तरंगे मन में उठीं तो मैं अपनी डायरी में उन्हें सहेजने लगा तभी वहाँ का स्टाफ महेश आया और बोला की भैया यहाँ इनको भी बैठा दूँ , कोई दिक्कत तो नहीं है ना , देखिये ना आज वैलेंटाइन के चलते भीड़ बहुत है तो कोई सीट खाली नहीं है।

मैंने बिना ऊपर देखे ही हाँ में जवाब दिया और बोला की अरे यार महेश मेरी कॉफी भी रखता जा , कब से इन्तजार कर रहा हूँ।

लगभग 5 मिनट बीत चुके थे , अचानक से एक प्यारी सी आवाज कानों में मिश्री घोलने लगी , अरे आपकी काफी ठंडी हो रही है मिस्टर ....!!

सुनते ही दिल मचल गया , नजरें सामने की चेयर पर बैठे खूबसूरत चेहरे पर जो टिकी तो टिकी ही रह गई , क्या खूबसूरती थी रेशमी बाल, कटारी जैसे नैन, नाक में नथ और गुलाब से गुलाबी होठ ......उफ्फ ...!!

तभी वो फिर बोल पड़ी - बड़े अजीब हैं आप , बार - बार खो जा रहे हैं , अभी तक डायरी में और अब .... ये सुनकर मेरे जेहन से उसका तिलिस्मी जादू टूटा और मैं मुस्कुरा उठा,  देखा तो वो आँखों से कॉफी की तरफ इशारा कर रही थी , मैंने पूछा की ये कब आई तो वो लड़की बोली की जब मैं आई तभी वेटर हम दोनों की कॉफी रख गया था।

फिर वो पूछी की - वैसे इतनी तल्लीनता से लिख क्या रहे हो आप ? 
और पूछते - पूछते टेबल पर रखी मेरी डायरी को अपनी तरफ खींच ली , आज पहली बार बिना मेरी अनुमति के किसी गैर के हाथों में मेरी डायरी जाने पर भी मैं खुश था ..... अरे नहीं गैर कहाँ , उस दिलकश लड़की को तो अपने ही नजरों की गवाही में मेरे दिल ने पसन्द कर लिया था।

ओह हो , लेखक हैं आप और प्रेम कहानी लिख रहें हैं ..... वो लगभग दो मिनट पढ़ने के बाद पूछी .!
मैंने कहा - हाँ , मेरी आने वाली किताब की आखिरी कहानी है , जल्द ही किताब छपकर आ जायेगी।

उसने मुझे बताया की वो अपने शहर में होने वाली लगभग सभी साहित्यिक कार्यक्रमों में सम्मिलित होती है क्योंकि उसे ये कविता - कहानी की दुनिया बहुत लुभाती है और उसके मरहूम पापा भी कवि थे।

लगभग 4 - 5 घंटे की बातचीत में हम दोस्त बन चके थे , एक दूसरे की तारीफों और मजाक के साथ - साथ ऐसे ही मजेदार बातें होती रहीं और धीरे - धीरे शाम हो गई , अचानक मेरे घर से फोन आने के कारण मुझे वहाँ से निकलना हुआ और इस दौरान मैं उसका नम्बर नहीं ले पाया पर इतना तो पता चल ही गया था की वो इंदौर में कोई कम्पनी चलाती है और यहाँ किसी मीटिंग के चक्कर में आई थी , और टिकट दूसरे दिन का होने की वजह से आज के दिन फ्री थी , अरे हाँ मैंने आपको उस परी का नाम तो बताया ही नहीं, उसका नाम अर्चना था।

मेरे घर आने के बाद पूरी शाम तो मैं व्यस्त रहा मगर जब रात को अपनी अधूरी कहानी लिखने बैठा तो लिख नहीं पाया , जेहन में कुछ नई बातें आने की बजाय उसी का खूबसूरत सा अक्स उभर जा रहा था , लगातार पूरे हफ्ते परेशान रहने के बाद भी आखिरकार मैं कहानी पूरी नहीं कर पाया था मैंने प्रकाशक से बात किया की इस आखिरी कहानी की अधूरा ही छोड़ते हैं जो की किताब के अगले संस्करण में पूरी हो जायेगी प्रकाशक को भी पाठकों का ध्यान आकर्षित करने का ये तरीका पसन्द आया मगर असली बात तो ये थी की मैंने इस कहानी को अर्चना की वजह से नहीं लिख पाया था , अंततः किताब छपकर आ गई थी और प्रकाशक से बातचीत के दौरान किताब के विमोचन के लिए जिन 10 शहरों का नाम लिखा गया था उसमें इंदौर भी फिक्स करा लिया था मैंने , और अपनी अधूरी कहानी को पूरी करने चल पड़ा था।

ढेर सारे इन्तजार और लगातार 7 शहरों में विमोचन के पश्चात आज वो घड़ी भी आ गई थी की इंदौर में भी विमोचन होना था।

आज सुबह जल्दी ही उठ गया था और नहा - धोकर भगवान् के सामने बाकी दिनों की अपेक्षा लगभग दोगुना समय खड़ा रहा और ये मिन्नत करता रहा की काश आज शहर में अर्चना दिख जाय।

 मैं होटल से कार्यक्रम स्थल जाने के दौरान शहर में भी यहाँ वहाँ तकता रहा की कहीं एक झलक मिल जाय यूँ ही देखते देखते मैं कार्यक्रम स्थल पर पहुँच चुका था, वहाँ उपस्थित गणमान्य अतिथियों से मिलने के दौरान मुझे अर्चना भी दिखाई दी, मैंने आयोजक से कन्फर्म करना चाहा तो उसने बताया की ये इस शहर की सबसे कम उम्र की बिजनेसमैन मिस धरा अवस्थी हैं, मुझे ये सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ की ये धरा अवस्थी है या अर्चना ....!!

मैं पूरे विमोचन कार्यक्रम के दौरान विस्मित सा रहा, अपनी बारी आने पर मैंने भी अपनी किताब 'खयालात' के बारे में वक्तव्य दिया और खासकर आखिरी में वही अधूरी कहानी सुनाई जिसमें अर्चना अरे नहीं , मिस धरा अवस्थी से हुई मुलाक़ात का जिक्र था, इस दौरान मैंने उनके चेहरे के बदलते भावों को देखा, अब मुझे विश्वास हो चुका था की ये वही मोहतरमा हैं।

विमोचन के आखिरी क्षणों में जब मुझे वो कुछ देर के लिए अकेले दिखीं तो मैंने उनके झूठे चेहरे का कारण पूछा तो उन्होंने शाम को शहर के एक कैफे में आने का समय दिया और दूसरे लोगों से व्यस्त हो गईं।

अब मुझे और भी अजीब लगा मगर हाँ इस बात की भी ख़ुशी थी की ये वही लड़की है जिसे मैं पहली नजर में ही पसन्द करने लगा हूँ और शायद आज अपना हाल ए दिल बताकर इजहार भी कर सकूँगा।

शाम को तय वक्त से ठीक पहले ही मैं कैफ़े पहुँचा क्योंकि मैं दूसरे बार के मिलने में देर से पहुँच कर गलती नहीं करना चाहता था वो भी तब जब मुझे उनके सबसे इस नए व्यस्ततम रूप का पता चला था , तय वक्त पर धरा वहाँ आई , सामान्य औपचारिकता के बाद उसने कुछ आर्डर किया और मुझसे भी पूछा तो मैंने कहा की कुछ भी अपने पसन्द का मँगवा लो , क्योंकि इस नए शहर के बारे में और यहाँ के लोगो के बारे में मैं तो समझ ही नहीं पाया हूँ।

मेरा व्यंग्य वो समझ चुकी थी अतः मुस्कुराते हुए बोली - डोंट वरी , आज समझा दूंगी, यूँ ही बातों का सिलसिला बढ़ा और बातों के दरम्यान उसने बताया की वो ब्लड कैंसर से पीड़ित है और लगभग छः महीने की ही जिंदगी बची हुई है , चूँकि उसके परिवार में कोई नहीं है और वो एक ट्रस्ट के लिए बिजनेस कर रही है।

चूँकि अब तक मेरी चाहतें उफान मार रही थीं अतः मैंने उसे अपने साथ रहने का ऑफर दिया और अपने दिल की बात बताई।

मेरा हाल ए दिल सुनकर धरा मुस्कुराने लगी और कहने लगी की ......  आकाश , यही कारण है की मैं अलग शहरों में लोगों से अलग नाम के साथ मिलती हूँ , ताकि लोगों को मेरी आदत ना लगे अपितु वो मेरे झूठ से खुद ही नाराज हो जायें और हाँ मैं आपके साथ नहीं रह सकती क्यों की मेरे पास तो कुछ ही समय बचा हुआ है तो मैं उसे पैसे और सुविधा के रूप में इन बच्चों को देना चाहती हूँ , वैसे भी क्षणिक समय के लिए आपके जिंदगी में मेरा आना भी आपको दुःख ही देगा।

ये सब सुनकर मैं गहन आश्चर्य में डूबा हुआ उसके जीवन के बारे में सोच रहा था की कैसी उसकी जीवटता है और कैसा उसका ह्रदय !


कैसे वो अपने हर आखिर पल को छोटे अनाथ बच्चों के स्वर्णिम भविष्य में बदल देना चाहती है , खैर जब मेरी तन्द्रा टूटी तो मैंने देखा वो चली गई थी और टेबल पर  एक कागज़ का टुकड़ा रखा था जिस पर लिखा था - 
आकाश , माफ़ करना की मैं तुम्हारे सामने दो बार दो नामों के साथ आई ये बात तुम्हें बहुत ही विचलित की होगी पर क्या है की मेरे पास किसी से नए रिश्ते बनाने के लिए ना तो वक्त है ना ही जरुरत है।
हाँ इतना जरूर कहना चाहूंगी की बहुत मजा आता है जब आप दूसरों के लिए भी जी रहे हों , आत्मिक संतुष्टि मिलती है और मैं चाहूँगी की आप भी अपने स्तर से ये कार्य करें , अगर मुझसे मुहब्बत है तो .......वैसे भी आकाश और धरा का मिलन कब सम्भव है !


                    सुमित सोनी

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प्रेम पत्र - love later

प्रेमपत्र

सुनो ,
            जब मैंने तुम्हे पहली बार देखा था न तभी से तुम मेरे जेहन में बस गई हो सोते जागते हँसते रोते खाते पीते समय , यानी की हर समय मुझे तुम्हारी ही प्यारी सी सूरत दिखाई देती है

जब से नजरो में आई हो 
तुम तो दिल में छाई हो 
हो गया हूँ जैसे बेबस मैं 
तुम तो मेरी जिंदगी में समाई हो ।

वही झील सी आँखे वही नदियो के मुहाने से खूबसूरत होंठ प्यारी सी नाक भोला भाला और सबसे अच्छा वाला चेहरा और इस चेहरे पर लटकती हुई तुम्हारी ये लटें जिन्हें तुम अपने हांथो की अँगुलियों से बार बार उठाकर कान के पीछे फंसा देती हो और ये है की किसी बदमाश की तरह फिर से तुम्हारे कोमल से गालों पर तुम्हे छेड़ने के लिए आ जाते है ।

झील सी आँखे और गुलाबी गाल देखूं
रब का बनाया एकशक्शकमाल देखूं
जो तू नहीं तो शायदगरीब हो जाऊं
और तू मिले तो मैं मालामाल हो जाऊँ

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