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वर्तमान हिंदी सिनेमा

                वर्तमान हिंदी सिनेमा

हम आज आदरणीय दादा साहब फाल्के जी के द्वारा लगाये गए उस बीज की चर्चा कर रहे है जो आज एक विशाल वृक्ष का रूप ले चुका है ।
हिंदी सिनेमा आज हमारे मनोरंजन के साथ - साथ कुछ नए तहजीबों और नए तरीकों को सिखने का एक जरिया भी है इसी के वजह से हम अपने देश तथा विदेशों के भी अन्य विशेष गुणों को सिख लेते है जिन्हें हम शायद प्रत्यक्ष रूप से कभी भी जान नही पाते ।
विगत कई वर्षों से रामायण - महाभारत तथा पुराणों से  संबंधित कई फिल्में आई जिन्हें देखकर लोग कुछ अपने धार्मिक पुराणों और उनके किरदारों तथा पूज्य देवी देवताओं के बारे में रोचकता पूर्वक अधिक जानकारी भी प्राप्त किये ।

कुछ पारिवारिक पृष्ठभूमि की बेहतरीन फ़िल्में भी आई जिनके कारण हमारे समाज के रहन - सहन में भी थोड़ा और बदलाव आया जिससे हम अपने संस्कारों के साथ- साथ आधुनिक भी बनें ।

21 वीं सदी का यह दौर भी भारतीय सिनेमा में एक नए किस्म का बदलाव लेकर आया अब कई तरह की फ़िल्में बनने लगी है जिनमे से कुछ तो हमारे समाज के लिए सकारात्मक सन्देश देती है परंतु कुछ फ़िल्में ऐसी भी होती है जिनके कारण  दर्शक अपने जीवन की वास्तविकता से दूर होकर हवाई किले बनाने लगता है । कुछ फिल्मों में तो अश्लीलता दिखाने में भी संकोच नहीं होता । इनका किशोर मन पर बहुत बुरा प्रभाव पडता है । ऐसे फिल्मो को देखकर किशोर छोटी उम्र में ही अपने आवेगो पर से नियंत्रण खो बैठते है । कुछ लोगों के अंतर्मन पर मार-काट, हिंसा, बलात्कार, चोरी और डकैती आदि के व्यापक प्रदर्शन का बहुत  बुरा प्रभाव पड़ता है।

परंतु अब कुछ 3 - 4 वर्षों से हिंदी सिनेमा के विषय में फिर से बदलाव आने लगा है और अब तो उन सभी विषयों पर फिल्म बन रही है, जिसे समाज में कभी छिपाया जाता था. जैसे मानसिक रोग, समलैंगिकता, वैश्या बाज़ार, लिव-इन रिलेशनशिप, तलाक़, एक से ज्यादा प्रेम-संबंध. यह सब ऐसे विषय है जिन पर आज भी समाज का कई वर्ग बात करने से भी कतराता है. लेकिन फिल्मों के माध्यम से अब इन सभी विषयों पर लोग आपस में बात करने लगे है. इन सभी विषयों को समाज का हिस्सा मानने लगे है जिस से जागरूकता ही फैली है।

हाइवे जैसी फिल्में इसी सिनेमा के आज के परिवेश की देन हैं जिनसे अपने परिवार में लड़कियों पर हो रहे शोषण के विरुद्ध आवाज उठाने को ताकत और तरीका मिलता है , कुछ बायोपिक फ़िल्में जो की किसी विशेष व्यक्तित्व के जीवन पर आधारित होता है जिन्हें देख कर हमे भी जीवन मे कुछ कर गुजरने की प्रेरणा मिलती है  मैरीकॉम और भाग मिल्खा भाग ऐसे फिल्मो के जबर्दस्त उदाहरण है ।


अभी हाल ही में एक सुल्तान नाम की फ़िल्म भी आई थी जो हमे हमारे सामान्य जीवन से जुडी लगने के कारण सकारात्मक विचारों से लबरेज कर रही थी ।

ऐसी ना जाने कितनी ही फिल्में आई जिन्होंने हमें कुछ अच्छा सिखाया तथापि कुछ बुरी फ़िल्में भी आई जिनके जिम्मेदार सिर्फ निर्माता ही नहीं वरन् कुछ हद तक दर्शक भी है यदि दर्शक ही ऐसे फिल्मों को सिरे से ख़ारिज कर दें जिनमे फूहड़ और अश्लील  दृश्यों और शब्दों से सजाया गया है तो ऐसी फिल्म आना स्वतः ही बंद हो जायेगी ।


उपसंहार - यदि हम गौर करे तो ऊपर बताई गई हानियाँ सभी सिनेमा की बुराइयाँ नहीं कही जा सकती , कुछ बुरी फिल्मों का कारण उसके निर्माताओं की अज्ञानता और धन-लोलुपता है। यदि निर्माता का उद्देश्य केवल धन कमाना ही ना हो तो हमारी फिल्मो का स्तर और भी ऊँचा उठ सकता है और इनकी मदद से देश का बड़ा उपकार हो सकता है । यदि इन बुराइयों को दूर कर दिया जाये, तो निश्चय ही हमारा भारतीय सिनेमा मानव-जीवन के विकास और देश के निर्माण में बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है ।


©सुमित चंद्र सेठ
सुमित कुमार सोनी
9450489148
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राष्ट्रप्रेम

राष्ट्रप्रेम


”जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ।”

अर्थात्

मनुष्य ही नहीं वरन् चर-अचर, पशु-पक्षी सभी अपनी मातृभूमि से प्यार करते हैं ।


राष्ट्रप्रेम - राष्ट्र के प्रति सम्मान भाव रखना ,सदैव राष्ट्रहित में तत्पर रहना राष्ट्रप्रेम कहलाता है ।

राष्ट्र प्रेम हमारे अंदर की वो भावना है जो हमें अपने राष्ट्र के प्रति कृतज्ञ बनाती है , इसी भावना तथा श्रद्धा के कारण ही बहुत से वीर मातृभूमि के लिए प्राण भी दे चुके है और बहुत से वीर जवान अभी जज्बा भी रखते है ।


राष्ट्रप्रेम का अर्थ सिर्फ यह नही है की हम सीमा पर जाकर दुश्मन देशों से युद्ध कर के ही प्रेम जताए , स्थान से ज्यादा हमारा भाव महत्त्व रखता है हम युद्ध के अलावा नित्यप्रति भी अपने कर्मों से राष्ट्रप्रेम कर सकते है लेकिन याद रखें की हमे सिर्फ राष्ट्र प्रेम करने की आवश्यकता है , राष्ट्रप्रेम करते हुए दिखावा करने की नहीं ।



शायद आप लोगों ने भी अपने बचपन में स्वामी रामतीर्थ के जापान यात्रा के दौरान घटित हुए प्रसंग को पढ़ा होगा , जब स्वामी रामतीर्थ एक रेलवे स्टेशन पर अच्छे फलों की तलाश में थे और उन्होंने कहा की शायद यहां अच्छे फल मिलते ही नही तो एक ज…

खुला खत - 1 (शोहदों के नाम )

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नमस्कार ,

                समझ नहीं आता की कैसे और कहाँ से शुरू करूँ , आखिरकार आप लोगों की करस्तानियाँ ही ऐसी हैं ।

आप कॉलेजों के बाहर , गलियों के मुहानो पर तथा नुक्कड़ों पर मिलने वाले वही महान विभूतियाँ है जो लड़कियों का जीना हराम कर देते हैं ।

                  यूँ ही आवारागर्दी करते करते आप को कोई भोली भाली सी लड़की पसंद आ जाती है, कुछ दिनों तक आप उसे राह चलते देख देख कर आँख सेकते हैं(आपकी भाषा में) ,  फिर उस लड़की का नाम पता करते हैं , अब आप उस लड़की से ना जाने किस सस्ते टाइप का प्यार करने लगते है जिसके मूल में देहाकर्षण ही होता है परंतु आप इसे सच्चे प्यार का नाम देते है और आप अब उस लड़की को पाने के लिए जमीन आसमान एक करने लगते हैं अपने दोस्तों वगैरह से बताते फिरते हैं सिवाय उस लड़की को बताने के !!!!


एक दिन वो भी आता है की आप अपने दोस्तों की बात मान लेते है और  बहुत हिम्मत करके अपना हाल ए दिल उस लड़की को बता देते हैं परंतु यह क्या ..............?

वो लड़की आप से प्यार करने से इन्कार कर देती है।


अब आपके अहंकार को ठेस पंहुचता है , आप सोचते है की उस लड़की की इतनी हिम…